पेरिस. फ्रांस की एक स्टार्टअप कंपनी ने ऐसा स्मार्ट चश्मा बनाया है, जो ड्राइवर को झपकी लगते ही अलर्ट कर देगा। आर्टिफिशियल
इंटेलिजेंस पर चलने वाली इस डिवाइस में 15 तरह के सेंसर्स लगे हैं। यह सेंसर गाड़ी चलाने वाले इंसान की एक्टिविटीज को रिकॉर्ड करते हैं। इसके
आधार पर ही नींद आने की स्थिति पर नजर रखते हैं।
ये स्मार्ट चश्मे फ्रांस के नीस शहर की एक कंपनी ‘एल्सी हेल्दी’ ने बनाए हैं। कंपनी के सीईओ फिलिप पेयरार्ड के मुताबिक, सड़क पर सुरक्षा बढ़ाने और
दुर्घटनाओं को कम करने में यह चश्मे कारगर साबित हो सकते हैं।
पेयरार्ड ने बताया कि चश्मे में जायरोस्कोप, एक्सलेरोमीटर, इंफ्रारेड थर्मल और लाइट सेंसर लगे हैं, जो ड्राइवर की एक्टिविटीज पर नजर रखते हैं। यही सेंसर्स ड्राइवर के सिर झुकने, पलक झपकने और जम्हाई आने जैसी
गतिविधियों पर नजर रखते हैं और ड्राइवर को अलर्ट करते हैं।
नींद की आशंका होते ही ये चश्मे फ्रेम में लगे स्पीकर और लाल रंग की एलईडी लाइट की मदद से ड्राइवर को अलर्ट कर देते हैं। गाड़ी चलाने वाले के
मोबाइल पर भी एक अलर्ट मैसेज पहुंच जाता है, जिसमें उसे नींद लेने की
हिदायत दी जाती है।
पेयरार्ड के मुताबिक, इस चश्मे को लोग अपनी पावर के आधार पर भी तैयार करा सकते हैं। साथ ही एक बार चार्जिंग के बाद यह स्मार्ट चश्मे 24 घंटे तक
लगातार काम करते हैं। फिलहाल इसकी शुरुआती कीमत 250 डॉलर (18 हजार रुपए)
रखी गई है।
केंद्र सरकार एक ओर 3,000 करोड़ रुपए खर्च करके और अंग्रेजी के शब्दों का
प्रयोग कर चाइनीज ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ स्थापित करती है,दूसरी ओर राज्यसभा
में बयान देती है कि 2.14 लाख करोड़ रुपए का बैंकों का नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) यानी बट्टे खाते का कर्ज माफ कर दिया गया है, तीसरी ओर सरकार के
मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा करते हैं कि सरकार अपनी अंतरिक्ष संबंधी
गगनयान योजना पर 10,000 करोड़ रुपए खर्च करेगी, चौथी ओर सरकार कह रही है कि
गरीब सवर्णों को नौकरियों एवं शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण का संविधान संशोधन बिल लाएगी।
किंतु जब दलितों की बारी आई तो इस वर्ग के तीन लाख परिवारों से मांगकर भीम महासंगम में जमीन पर समरसता खिचड़ी खिलाकर बहला दिया। यह कैसा विरोधाभास
है? यह कैसी विडम्बना है? सवर्ण समाज के गरीबों के उत्थान के लिए सरकारी
नौकरी और दलितों के उत्थान के लिए केवल समरसता खिचड़ी। इतना ही नहीं सरकार 4200 करोड़ रुपए खर्च करके एक महीने के लिए आस्था का कुंभ मेला लगा रही है।
क्या इस राशि को कम करके दलितों, किसानों एवं गरीबों के लिए नौकरियां सृजित
करने में नहीं लगाया जा सकता था।
सभी वर्गों की युवा आबादी को आज नौकरियों की सख्त आवश्यकता है। सरकार ने
संसद में एक अन्य बयान में यह भी बताया है कि 24 लाख पद आज भी रिक्त पड़े हैं परंतु सरकार उन्हें भरने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है। अगर सरकार
इन नौकरियों पर कुछ हजार करोड़ रुपए खर्च करती तो सभी समाजों के बेरोजगार
नौजवानों को फायदा होता। यह स्वस्थ समाज की दिशा में रचनात्मक कदम होता।
परंतु यह सरकार तो पॉलिटिकल स्टन्ट करने के लिए चुनावी वर्ष में दलितों को समरसता खिचड़ी खिला रही है।
यह कैसी सोच है, जब हमारा देश 21वीं सदी के कंप्यूटर युग में बहुराष्ट्रीय
कंपनियों की कतार के साथ विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने का दावा
कर रहा है, तब हम दलितों को समरसता का पाठ पढ़ाने के लिए उन्हीं के घरों से मांगी हुई खिचड़ी खिलाने का सार्वजनिक महासम्मेलन कर रहे हैं।
वह भी भीम महासंगम के नाम से। यानी बाबा साहेब आम्बेडकर को एक बार फिर
संकुचित नज़रिये से परिभाषित कर उन्हें केवल दलितों का मसीहा घोषित किया
गया, जबकि सभी जानते हैं कि बाबासाहेब ने समाज के सभी वर्गों के लिए कार्य
किया। विशेषकर भारतीय महिलाओं के अधिकारों के लिए हिंदू कोड बिल लाकर उनकी
लड़ाई लड़ी।
इतना ही नहीं बाबासाहेब ने राष्ट्रीय निर्माण हेतु संविधान के साथ अनेक
संस्थाओं एवं योजनाओं के सृजन में अपना योगदान दिया। फिर उनको दलितों तक
सीमित करना एक स्वस्थ परम्परा से परे है। यह संकीर्ण सोच बदलनी चाहिए।
सभी जानते हैं कि आज भूमंडलीकरण एवं सूचना क्रांति के इस युग में दलित समाज सत्ता, संसाधन, शिक्षा (तकनीकी, कंप्यूटरीकृत, प्रबंधन, उच्च शिक्षा) एवं
स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी मांग रहा है। ऐसी परिस्थिति में उसे ज्यादा से ज्यादा स्कॉलरशिप चाहिए।
विदेशी विश्वविद्यालयों की डिग्री के लिए वजीफा चाहिए तो यूजीसी उसकी
स्कॉलरशिप ही रोक रहा है। शिक्षण संस्थाओं विशेषकर स्नातक एवं स्नातकोत्तर विश्वविद्यालयों में दलितों के आरक्षण के साथ खिलवाड़ कर पहले उसे प्रभावहीन
बनाने का प्रयास किया गया और बाद में उस पर रोक लगाकर उसे निष्प्रभावी कर
दिया गया।
उत्तर भारत के लगभग डेढ़ सौ विश्वविद्यालयों में दलित समाज का एक भी वाइस चांसलर नहीं है। यहां तक कि बाबासाहेब आम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय
लखनऊ एवं आम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में कुलपतियों की नियुक्तियां कई
वर्षों से लंबित हैं परंतु यहां किसी को नियुक्त ही नहीं किया जा रहा है।
आज गणतंत्र के 69वें वर्ष में दलित समाज आर्थिक एवं राजनीतिक निर्णयों में
अपनी भागीदारी मांग रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की मुनाफा कमाती कंपनियां
-जिनमें दलितों का अारक्षण था- उन्हें औने-पौने दामों में क्यों बेचा जा
रहा है, वह इसे समझना चाहता है।
इस देश को गगनयान, बुलेट ट्रेन या नदियों पर लैंड करने वालों विमानों की
आवश्यकता है, इस निर्णय में भागीदार बनकर वह भी देश के विकास की
प्राथमिकता तय करना चाहता है। किंतु जब राष्ट्रीय व राज्यस्तर पर सरकार के
मंत्रियों पर नज़र डालते हैं तो एक भी दलित नहीं दिखाई देता है, जिसके पास ऐसा मंत्रालय है जिसमें वह आर्थिक विकास व उत्थान की बात सोच सके।
यहां तक कि स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के तहत जो दलितों के हिस्से का पैसा
हर विभाग को अलग करना होता है उस पर भी दलित मंत्री अपनी सक्रियता नहीं
दिखा सकते और न ही कोई प्रश्न पूछ सकते हैं। और तो और भारतीय जनता पार्टी
की ओर से राष्ट्रीय टेलीविजन पर बहस में सरकार एवं राजनीतिक दल का पक्ष
रखने के लिए दलित वर्ग का एक भी प्रवक्ता नहीं मिलेगा। यह तो दलितों के प्रतिनिधित्व की वास्तविकता है।
अत: ऐसी स्थिति में दलितों को यह लगता है कि समरसता के लिए दलितों के घरों
से लाई गई खिचड़ी खिलाना उनका उपहास उड़ाना है। दलितों को यह लगता है कि
उन्हें बार-बार यह एहसास कराया जाता है कि यद्यपि वे आज भी इस लायक नहीं है
कि कोई सामान्य व्यक्ति उनके साथ भोजन करें पर भाजपा एवं संघ के लोग उनके साथ भोजन कर रहे हैं। ऐसा करके वे अपने आपको प्रगतिशील एवं सहिष्णु
प्रमाणित करने का असफल प्रयास करते हैं।
लेकिन सोचने की बात है कि क्या ऐसे प्रतीकात्मक आयोजनों की वाकई कोई प्रासंगिकता है? हर बार दलितों के घर में या उनके साथ भोजन करते हुए
तस्वीरों का समाचार-पत्रों में छपना या टीवी पर खबर का चलना इसी सोच को प्रमाणित करता है। सत्ता में बैठे लोग सामंतवादी सोच छोड़कर दलितों को सत्ता
एवं संसाधन में भागीदार बनाएं। यह समरसता से नहीं संरचनात्मक परिवर्तन से होगा, जिसके लिए दलितों को अपना प्रतिनिधित्व चाहिए। - विवेक कुमार (ये लेखक के अपने विचार हैं)
Tuesday, January 8, 2019
Thursday, December 20, 2018
الولايات المتحدة تمدد مهلة إعفاء العراق من عقوباتها على إيران
مددت الولايات المتحدة مهلة السماح للعراق باستيراد الطاقة
الكهربائية من إيران، لمدة 90 يوما، ما يتيح لبغداد تجاوز عقوبات واشنطن
على طهران بسبب برنامجها النووي.
ونقلت وكالة "فرانس برس" عن مصدر عراقي حكومي مشارك في وفد
يضم مسؤولين عراقيين إلى واشنطن للتفاوض على تمديد فترة الإعفاء من
العقوبات ضد إيران، قوله إن العراق ضمن تمديد المهلة لفترة 90 يوما، وبذلك
يتمكن العراق من الاستمرار في شراء الكهرباء والغاز الإيرانيين.وردا على سؤال حول ما إذا كانت الولايات المتحدة قد ضغطت على الوفد العراقي للدخول في شراكة مع الشركات الأمريكية لسد الفجوة القائمة، أوضح المصدر نفسه أن هذه القضية جزء من "مناقشات معقدة".
وقد حصل العراق في الخامس من نوفمبر على إعفاء لمدة 45 يوما من العقوبات التي فرضتها الولايات المتحدة على إيران في ملف برنامجها النووي، وكان من المفترض أن تخصص لوضع خارطة طريق تلغي بموجبها بغداد اعتمادها التام على استخدام الكهرباء والغاز الإيراني.
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وللتغلب على هذا النقص، يستورد العراق ما يصل إلى 28 مليون متر مكعب من الغاز الطبيعي من طهران لمصانعه، كما يشتري بشكل مباشر 1300 ميغاواط من الكهرباء الإيرانية.
وهذا الاعتماد غير مريح بالنسبة للولايات المتحدة التي سعت لتقليص نفوذ طهران وإعادة فرض العقوبات على المؤسسات المالية الإيرانية وخطوط الشحن وقطاع الطاقة والمنتجات النفطية.
والأسبوع الماضي، ناقش وزير الطاقة الأمريكي ريك بيري العقوبات مع وزيري النفط والكهرباء العراقيين في بغداد، قائلا إن على بغداد فتح الأبواب أمام الشركات الأمريكية لتحقيق الاستقلالية في مجال الطاقة.
أكد حزب "نداء تونس"، أن الرئيس التونسي قائد السبسي، يقوم
بالتشاور مع الدول الشقيقة حول توجيه دعوة رسمية لنظيره السوري، بشار
الأسد، لحضور القمة العربية في مارس المقبل.
جاء ذلك في أول تعليق لحزب نداء تونس الحاكم على أنباء من مصادر في الرئاسة التونسية، تحدثت عن نية الرئيس التونسي، دعوة الرئيس بشار الأسد لحضور القمة.ونوه المتحدث باسم حزب "حركة نداء تونس"، منجي الحرباوي، بأن موقف تونس يبقى دائما متناسقا مع موقف الدول العربية الشقيقة، ولذلك لن تبت تونس في مشاركة الرئيس السوري في القمة، إلا بعد التنسيق والتشاور مع الدول العربية الأخرى.
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وقال المتحدث، إن حزب "نداء تونس"، يرحب بعودة سوريا إلى جامعة الدول العربية، وبحضور رئيسها للقمة العربية في تونس للم الشمل العربي
Wednesday, December 5, 2018
دعوات لتظاهرات عراقية حاشدة رفضا للإملاءات الإيرانية
دعا التيار المدني العراقي إلى تظاهرات حاشدة في بغداد، يوم الخميس، في وجه الهيمنة الإيرانية على جميع مفاصل الحياة في البلاد.
قال الجيش الأميركي إنه قتل أربعة متشددين في ضربة جوية ضد حركة الشباب
الإرهابية في محيط أودهيجل بالصومال في إطار عملياته لدعم مساعي الحكومة لكسر شوكة الحركة.
وتأتي
الدعوة إلى التحرك، احتجاجاً على ما يعتبره التيار محاولات لفرض إملاءات إيرانية، تتعلق بالتدخل في فرض شخصيات معينة داخل الحكومة.
وكان ائتلاف النصر العراقي قد أكد، أن قائد فيلق القدس الإيراني قاسم سليماني، زار بغداد الثلاثاء الماضي، للضغط على رئيس الوزراء، عادل عبد المهدي، لتعيين رئيس هيئة الحشد الشعبي السابق، فالح الفياض وزيراً للداخلية.
وشدد الائتلاف، الذي يقوده رئيس الوزراء السابق حيدر العبادي، على أن تحالف الإصلاح، يرفض تعيين شخصيات غير مستقلة للوزارات الأمنية، مجدداً رفضه، لأي تدخلات خارجية في القرار العراقي.
وكان ائتلاف النصر العراقي قد أكد، أن قائد فيلق القدس الإيراني قاسم سليماني، زار بغداد الثلاثاء الماضي، للضغط على رئيس الوزراء، عادل عبد المهدي، لتعيين رئيس هيئة الحشد الشعبي السابق، فالح الفياض وزيراً للداخلية.
وشدد الائتلاف، الذي يقوده رئيس الوزراء السابق حيدر العبادي، على أن تحالف الإصلاح، يرفض تعيين شخصيات غير مستقلة للوزارات الأمنية، مجدداً رفضه، لأي تدخلات خارجية في القرار العراقي.
وفي
نفس السياق، أعلنت رئاسة مجلس النواب العراقي، أن جدول أعمال جلسة البرلمان
المقررة يوم الخميس، يخلو من التصويت على التشكيلة الوزارية.
وأضافت
رئاسة المجلس أن جدول أعمال الجلسة، يتضمن تأدية اليمين الدستورية لبعض
النواب، وعرض مشاريع القوانين، التي لم تشرع في الدورة السابقة، إلى جانب تشكيل لجنة تحقيق في العقود المبرمة بوزارة الكهرباء.
وقالت قيادة الجيش الأميركي في أفريقيا إن الضربة نفذت يوم 4 ديسمبر.
وأوضحت القيادة في بيان نشر، في وقت متأخر، أمس
الأربعاء "الضربة الجوية الأميركية نفذت ضد متشددين بعد أن تعرضت القوات الأميركية وشركاؤها لهجوم".
وأضافت: "تقييمنا الحالي هو أن الضربة قتلت أربعة إرهابيين دون أن يسقط أي مدني".
وتنفذ الولايات المتحدة ضربات جوية من حين لآخر في الصومال، دعما للحكومة المدعومة من الأمم المتحدة هناك، والتي تحارب ضد تمرد حركة الشباب منذ سنوات.قال الجيش الأميركي إنه قتل أربعة متشددين في ضربة جوية ضد حركة الشباب
الإرهابية في محيط أودهيجل بالصومال في إطار عملياته لدعم مساعي الحكومة لكسر شوكة الحركة.
وقالت قيادة الجيش الأميركي في أفريقيا إن الضربة نفذت يوم 4 ديسمبر.
وأوضحت القيادة في بيان نشر، في وقت متأخر، أمس
الأربعاء "الضربة الجوية الأميركية نفذت ضد متشددين بعد أن تعرضت القوات
الأميركية وشركاؤها لهجوم".
وأضافت: "تقييمنا الحالي هو أن الضربة قتلت أربعة إرهابيين دون أن يسقط أي مدني".
وتنفذ الولايات المتحدة ضربات جوية من حين لآخر في الصومال، دعما للحكومة المدعومة من الأمم المتحدة هناك، والتي تحارب ضد تمرد حركة الشباب منذ سنوات.
Monday, November 19, 2018
دول غربية تتهم روسيا بالسعي لعرقلة تحقيقات منظمة حظر الأسلحة الكيمياوية بعدم التصديق على ميزانيتها
اصطدمت روسيا مع الدول الغربية الاثنين إثر سعيها لمنع منظمة حظر
الأسلحة الكيمياوية من إدانة المسؤولين عن هجمات وقعت في سوريا وسالزبوري ببريطانيا.
وتبادل الطرفان تهما بالنفاق والكذب عندما كانت المنظمة الدولية تناقش توسيع صلاحياتها وفق برنامج متفق عليه في يونيو/ حزيران.
واتهمت الدول الغربية روسيا بالسعي لمنع منظمة حظر الأسلحة الكيمياوية من التحقيق في هجمات سوريا من خلال إقناع بعض الأعضاء بعدم التصديق على ميزانية المنظمة.
وتدعم روسيا في مسعاها كل من الصين وإيران.
ولكن الولايات المتحدة وبريطانيا اتهمتا روسيا "بالتراجع عن الاتفاق"، وأصرتا على أن يتواصل العمل من أجل تحديد المسؤولية في الهجمات مثلما اتفق عليه وحدد له تاريخا في مطلع العام المقبل.
ودعت الدول الغربية إلى توسيع صلاحيات منظمة حظر الأسلحة الكيمياوية بعد سلسلة من الهجمات الكيماوية في سوريا، فضلا عن هجوم بعامل الأعصاب استهدف جاسوسا روسيا سابقا في مارس/ آذار بمنطقة سالزبوري في انجلترا.
ووصف مبعوث روسيا، ألكسندر شولغين، مزاعم الدول الغربية باستعمال دمشق للأسلحة الكيمياوية بأنها "محض كذب"، وبأنها ذريعة "لصب صواريخها" على سورياونفى وزير الخارجية السوري، فيصل مقداد، أن تكون بلاده استعملت الأسلحة الكيمياوية، .
وقال في هجوم حاد على الدول الغربية: "أنتم الذين علمتم الناس استعمال الأسلحة الكيمياوية، أنتم الذين استعملتم الأسلحة الكيمياوية في الحربين العالميتين، أين أخلاقكم، هذا نفاق ومحض كذب".
وقال سفير الولايات المتحدة، كنيث وارد، إن مزاعم روسيا بأن صلاحيات المنظمة الجديدة غير شرعية و"نفاق مفضوح"، وحذر من السماح باستعمال الأسلحة الكيمياوية.
ومضى في حديثه عن روسيا: "ما فعلوه في الأعوام القليلة الماضية هو التواطؤ مع حليفتهم سوريا لدفن حقيقة ما حدث فيها، مع ضحايا الهجوم الكيمياوي الذي شنه نظام الأسد، ولم يكفهم ذلك فأضافوا هجوم سالزبوري".
وتتهم بريطانيا روسيا باستعمال عامل الأعصاب نوفيتشوك، الذي يعود إلى الفترة السوفييتية، في هجوم على الجاسوس السابق، سيرغي سكريبال، وقررت الدول الغربية بعدها فرض عقوبات على موسكو.
ووصف المبعوث البريطاني، بيتر ولسون، أي محاولة للحد من صلاحيات المنظمة في تحديد المسؤول عن الهجمات الكيمياوية أمر "غير مقبول".
وقال السفير الفرنسي، فيليب لاليو، إن خطة روسيا هي تأجيل تحديد المسؤولية إلى أجل غير مسمى، وهذا أمر "لا يمكن أن نقبله".
ويعد هذا أول اجتماع للمنظمة منذ طرد 4 روس تتهمهم هولندا بمحاولة قرصنة أجهزة منظمة حظر الأسلحة الكيمياوية في أكتوبر/ تشرين الأول باستعمال أجهزة إلكترونية مخبأة في سيارة مركونة قرب فندق مجاور.
وكانت المنظمة وقتها تحقق في الهجوم على الجاسوس السابق سكريبال، وفي الهجمات الكيمياوية في سوريا.
وقالت منظمة حظر الأسلحة الكيماوية إن اجتماع أعضائها وعددهم 193 سيناقش "مستقبل المنظمة".
وحذر المدير العام للمنظمة، فرناندو أرياس، من "الضغط على المعايير الدولية لاستعمال الأسلحة الكيمياوية". وقال إن استعمالها المتكرر يتطلب "ردا موحدا وحازما".
وتبادل الطرفان تهما بالنفاق والكذب عندما كانت المنظمة الدولية تناقش توسيع صلاحياتها وفق برنامج متفق عليه في يونيو/ حزيران.
واتهمت الدول الغربية روسيا بالسعي لمنع منظمة حظر الأسلحة الكيمياوية من التحقيق في هجمات سوريا من خلال إقناع بعض الأعضاء بعدم التصديق على ميزانية المنظمة.
وتدعم روسيا في مسعاها كل من الصين وإيران.
ولكن الولايات المتحدة وبريطانيا اتهمتا روسيا "بالتراجع عن الاتفاق"، وأصرتا على أن يتواصل العمل من أجل تحديد المسؤولية في الهجمات مثلما اتفق عليه وحدد له تاريخا في مطلع العام المقبل.
ودعت الدول الغربية إلى توسيع صلاحيات منظمة حظر الأسلحة الكيمياوية بعد سلسلة من الهجمات الكيماوية في سوريا، فضلا عن هجوم بعامل الأعصاب استهدف جاسوسا روسيا سابقا في مارس/ آذار بمنطقة سالزبوري في انجلترا.
ووصف مبعوث روسيا، ألكسندر شولغين، مزاعم الدول الغربية باستعمال دمشق للأسلحة الكيمياوية بأنها "محض كذب"، وبأنها ذريعة "لصب صواريخها" على سورياونفى وزير الخارجية السوري، فيصل مقداد، أن تكون بلاده استعملت الأسلحة الكيمياوية، .
وقال في هجوم حاد على الدول الغربية: "أنتم الذين علمتم الناس استعمال الأسلحة الكيمياوية، أنتم الذين استعملتم الأسلحة الكيمياوية في الحربين العالميتين، أين أخلاقكم، هذا نفاق ومحض كذب".
وقال سفير الولايات المتحدة، كنيث وارد، إن مزاعم روسيا بأن صلاحيات المنظمة الجديدة غير شرعية و"نفاق مفضوح"، وحذر من السماح باستعمال الأسلحة الكيمياوية.
ومضى في حديثه عن روسيا: "ما فعلوه في الأعوام القليلة الماضية هو التواطؤ مع حليفتهم سوريا لدفن حقيقة ما حدث فيها، مع ضحايا الهجوم الكيمياوي الذي شنه نظام الأسد، ولم يكفهم ذلك فأضافوا هجوم سالزبوري".
وتتهم بريطانيا روسيا باستعمال عامل الأعصاب نوفيتشوك، الذي يعود إلى الفترة السوفييتية، في هجوم على الجاسوس السابق، سيرغي سكريبال، وقررت الدول الغربية بعدها فرض عقوبات على موسكو.
ووصف المبعوث البريطاني، بيتر ولسون، أي محاولة للحد من صلاحيات المنظمة في تحديد المسؤول عن الهجمات الكيمياوية أمر "غير مقبول".
وقال السفير الفرنسي، فيليب لاليو، إن خطة روسيا هي تأجيل تحديد المسؤولية إلى أجل غير مسمى، وهذا أمر "لا يمكن أن نقبله".
ويعد هذا أول اجتماع للمنظمة منذ طرد 4 روس تتهمهم هولندا بمحاولة قرصنة أجهزة منظمة حظر الأسلحة الكيمياوية في أكتوبر/ تشرين الأول باستعمال أجهزة إلكترونية مخبأة في سيارة مركونة قرب فندق مجاور.
وكانت المنظمة وقتها تحقق في الهجوم على الجاسوس السابق سكريبال، وفي الهجمات الكيمياوية في سوريا.
وقالت منظمة حظر الأسلحة الكيماوية إن اجتماع أعضائها وعددهم 193 سيناقش "مستقبل المنظمة".
وحذر المدير العام للمنظمة، فرناندو أرياس، من "الضغط على المعايير الدولية لاستعمال الأسلحة الكيمياوية". وقال إن استعمالها المتكرر يتطلب "ردا موحدا وحازما".
Thursday, October 11, 2018
र्ष, उल्लास, नृत्य और संगीत का उत्सव आज से
भोपाल। शहर का सबसे बड़ा गरबा उत्सव अभिव्यक्ति गुरुवार
11 अक्टूबर से शुरू होने जा रहा है। अपने बीसवें साल में अभिव्यक्ति
प्रस्तुत है नए जोश, सुविधाओं और सहूलियतों के साथ। पहले दिन एंट्री केवल
पास धारियों के लिए है। दूसरे दिन से टिकट और ऐप से एंट्री होगी। अभिव्यक्ति का साउंड सिस्टम हमेशा ही लोगों का पसंदीदा रहा है। इस बार एक
लाख वॉट के एडवांस्ड साउंड सिस्टम लगाए गए हैं।
अभिव्यक्ति गरबा के टाइटल स्पाॅन्सर जॉय कॉस्मेटिक्स इन एसोसिएशन विद स्पिंज बी.बी. फेयरनेस क्रीम, स्टाइल पार्टनर जेड ब्लू और को-स्पाॅन्सर्स श्री शिवम एंड आरडी मेमोरियल ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन हैं। स्टेज और मेन एंट्रेंस पर मोर बनाए गए हैं, स्टेज के बीचों-बीच श्रीधर जी विराजमान रहेंगे। फूड कोर्ट गांव की थीम पर है। स्टॉल्स भी झोपड़ीनुमा लुक में हैं, लोगों के बैठने के लिए चारपाइयों की व्यवस्था है।
दो मुख्य द्वार
अभिव्यक्ति में पहली बार दो मुख्य द्वार हैं। भास्कर द्वार कॉर्मल कॉन्वेंट स्कूल के सामने की तरफ बनाया गया है, इस पर एंट्री नंबर एक और दो हैं। दूसरा द्वार हेमा हायर सेंकेंडरी स्कूल की ओर है, जिसका नाम अभिव्यक्ति द्वार है। यहां पर एंट्री नंबर तीन और चार हैं।
एंट्री यहां से
ग्राउंड में एंट्री इस तरह से होगी
- ऑनलाइन टिकट वाले एंट्री नंबर 1 (भास्कर द्वार) और एंट्री नंबर 4 (अभिव्यक्ति द्वार) से।
- काउंटर से टिकट और पास लेने वाले एंट्री नंबर 2 (भास्कर द्वार) और एंट्री नंबर 3 (अभिव्यक्ति द्वार) से दाखिल हो सकेंगे।
- अभिव्यक्ति के सभी प्रतिभागियों और एेप वालों को एंट्री नंबर 4 (अभिव्यक्ति द्वार) से प्रवेश।
(नोट: एंट्री फैमिली व कपल्स के लिए। पुरुषों की सिंगल एंट्री नहीं होगी।)
ट्रैफिक व्यवस्था : एएसपी ट्रैफिक अरविंद दुबे ने बताया कि फिलहाल हमने डायवर्जन प्लान नहीं किया है, हमने एक्स्ट्रा फोर्सेस का इंतजाम कर दिया है, जिससे ट्रैफिक व्यवस्था सुगम रहे।
हाईलाइट्स
पार्किंग: लोगों की सुविधा के लिए सिक्योर्ड पार्किंग की व्यवस्था है जहां लगभग 1500 चौपहिया वाहन व लगभग 3000 दो पहिया वाहन खड़े हो सकेंगे।
दो एलईडी स्क्रीन: ग्राउंड में 22X10 फीट की दो एलईडी स्क्रीन लगाई गई हैं, ताकि गरबा ग्राउंड का अच्छा व्यू मिल सके।
फूड स्टॉल्स: विविध व्यंजनों की व्यवस्था यहां पर रहेगी जिनमें राजस्थानी फूड, अमृतसरी कुल्चा छोला, गुजराती व्यंजन, कलकत्ता के स्नैक्स, इंदौर स्ट्रीट फूड व फलाहारी, महाराष्ट्रियन खाना, आगरा के पराठे, पंजाबी व्यंजन व जलंधर की चाट की काफी वैराइटी उपलब्ध रहेगी।
विशाल स्टेज: इस बार अभिव्यक्ति का मुख्य स्टेज 100 फीट लंबा व 50 फीट चाैड़ा रहेगा।
अलग डाइनिंग स्पेस: बुजुर्गों के लिए अलग डाइनिंग स्पेस की व्यवस्था है।
भोपाल। शक्ति व साधना के नौ दिनी शारदीय नवरात्र पर्व का बुधवार को शुभ मुहूर्त में घट और देवी प्रतिमाओं के साथ शुभारंभ हुआ। शहर में करीब एक हजार स्थानों पर सजे पंडालों में मां दुर्गा-काली की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। बिट्टन मार्केट, न्यू मार्केट, विजय मार्केट बरखेड़ा, नेहरू नगर, एमपी नगर, पीपल चौक, सुभाष चौक व मंगलवारा आदि में लाखों की लागत से आकर्षक झांकियां सजाई गई हैं। इनमेंं कई पंडाल देश के प्रसिद्ध मंदिरों की प्रतिकृति के रूप में सजाए गए हैं।
नवरात्र की प्रतिपदा पर घरों, मंदिरों व झांकी पंडालों में घट स्थापना का सिलसिला सुबह से दोपहर तक और इसके बाद कई स्थानों पर शाम चार बजे से प्रारंभ हुआ, जो रात 9 बजे तक चलता रहा। देवी प्रतिमाओं की स्थापना कर लोगों ने पहले दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की आराधना की। इसके पूर्व मूर्तिकारों के यहां से भक्त दुर्गा-काली की प्रतिमाओं को पंडालों में लेकर पहुंचे। गुरुवार को मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी। नवरात्र का समापन 18 अक्टूबर को होगा।
टीला जमालपुरा झांकी पंडाल
मोती क्वाटर एरिया, टीला जमालपुरा में दुर्गा उत्सव समिति द्वारा तैयार किया गया झांकी पंडाल अन्य झांकियों से अलग हट कर है। इसमें प्रकृति और पर्यावरण सुरक्षा का संदेश देने के उद्देश्य से देवी पाताल भैरवी की भव्य मुखाकृति से प्रकट होने का दृश्य दिखाया गया है। खास बात यह है कि पाताल के अन्य दृश्य भी पंडाल में बनाए गए हैं। 10 हजार स्क्वायर फीट में तालाब बनाया गया है, जिसमें बतख तैरती दिखाई देती हैं। मनमोहक झरना भी बनाया गया है, वहीं श्रद्धालुओं को गुजरने के लिए एक छोटा पुल भी बनाया है। झांकी के एक अन्य हिस्से में आकाश का दृश्य भी है, जिसमें चांद पर विराजमान गणेश का दृश्य भी मनोहारी है।
अभिव्यक्ति गरबा के टाइटल स्पाॅन्सर जॉय कॉस्मेटिक्स इन एसोसिएशन विद स्पिंज बी.बी. फेयरनेस क्रीम, स्टाइल पार्टनर जेड ब्लू और को-स्पाॅन्सर्स श्री शिवम एंड आरडी मेमोरियल ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन हैं। स्टेज और मेन एंट्रेंस पर मोर बनाए गए हैं, स्टेज के बीचों-बीच श्रीधर जी विराजमान रहेंगे। फूड कोर्ट गांव की थीम पर है। स्टॉल्स भी झोपड़ीनुमा लुक में हैं, लोगों के बैठने के लिए चारपाइयों की व्यवस्था है।
दो मुख्य द्वार
अभिव्यक्ति में पहली बार दो मुख्य द्वार हैं। भास्कर द्वार कॉर्मल कॉन्वेंट स्कूल के सामने की तरफ बनाया गया है, इस पर एंट्री नंबर एक और दो हैं। दूसरा द्वार हेमा हायर सेंकेंडरी स्कूल की ओर है, जिसका नाम अभिव्यक्ति द्वार है। यहां पर एंट्री नंबर तीन और चार हैं।
एंट्री यहां से
ग्राउंड में एंट्री इस तरह से होगी
- ऑनलाइन टिकट वाले एंट्री नंबर 1 (भास्कर द्वार) और एंट्री नंबर 4 (अभिव्यक्ति द्वार) से।
- काउंटर से टिकट और पास लेने वाले एंट्री नंबर 2 (भास्कर द्वार) और एंट्री नंबर 3 (अभिव्यक्ति द्वार) से दाखिल हो सकेंगे।
- अभिव्यक्ति के सभी प्रतिभागियों और एेप वालों को एंट्री नंबर 4 (अभिव्यक्ति द्वार) से प्रवेश।
(नोट: एंट्री फैमिली व कपल्स के लिए। पुरुषों की सिंगल एंट्री नहीं होगी।)
ट्रैफिक व्यवस्था : एएसपी ट्रैफिक अरविंद दुबे ने बताया कि फिलहाल हमने डायवर्जन प्लान नहीं किया है, हमने एक्स्ट्रा फोर्सेस का इंतजाम कर दिया है, जिससे ट्रैफिक व्यवस्था सुगम रहे।
हाईलाइट्स
पार्किंग: लोगों की सुविधा के लिए सिक्योर्ड पार्किंग की व्यवस्था है जहां लगभग 1500 चौपहिया वाहन व लगभग 3000 दो पहिया वाहन खड़े हो सकेंगे।
दो एलईडी स्क्रीन: ग्राउंड में 22X10 फीट की दो एलईडी स्क्रीन लगाई गई हैं, ताकि गरबा ग्राउंड का अच्छा व्यू मिल सके।
फूड स्टॉल्स: विविध व्यंजनों की व्यवस्था यहां पर रहेगी जिनमें राजस्थानी फूड, अमृतसरी कुल्चा छोला, गुजराती व्यंजन, कलकत्ता के स्नैक्स, इंदौर स्ट्रीट फूड व फलाहारी, महाराष्ट्रियन खाना, आगरा के पराठे, पंजाबी व्यंजन व जलंधर की चाट की काफी वैराइटी उपलब्ध रहेगी।
विशाल स्टेज: इस बार अभिव्यक्ति का मुख्य स्टेज 100 फीट लंबा व 50 फीट चाैड़ा रहेगा।
अलग डाइनिंग स्पेस: बुजुर्गों के लिए अलग डाइनिंग स्पेस की व्यवस्था है।
भोपाल। शक्ति व साधना के नौ दिनी शारदीय नवरात्र पर्व का बुधवार को शुभ मुहूर्त में घट और देवी प्रतिमाओं के साथ शुभारंभ हुआ। शहर में करीब एक हजार स्थानों पर सजे पंडालों में मां दुर्गा-काली की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। बिट्टन मार्केट, न्यू मार्केट, विजय मार्केट बरखेड़ा, नेहरू नगर, एमपी नगर, पीपल चौक, सुभाष चौक व मंगलवारा आदि में लाखों की लागत से आकर्षक झांकियां सजाई गई हैं। इनमेंं कई पंडाल देश के प्रसिद्ध मंदिरों की प्रतिकृति के रूप में सजाए गए हैं।
नवरात्र की प्रतिपदा पर घरों, मंदिरों व झांकी पंडालों में घट स्थापना का सिलसिला सुबह से दोपहर तक और इसके बाद कई स्थानों पर शाम चार बजे से प्रारंभ हुआ, जो रात 9 बजे तक चलता रहा। देवी प्रतिमाओं की स्थापना कर लोगों ने पहले दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की आराधना की। इसके पूर्व मूर्तिकारों के यहां से भक्त दुर्गा-काली की प्रतिमाओं को पंडालों में लेकर पहुंचे। गुरुवार को मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी। नवरात्र का समापन 18 अक्टूबर को होगा।
टीला जमालपुरा झांकी पंडाल
मोती क्वाटर एरिया, टीला जमालपुरा में दुर्गा उत्सव समिति द्वारा तैयार किया गया झांकी पंडाल अन्य झांकियों से अलग हट कर है। इसमें प्रकृति और पर्यावरण सुरक्षा का संदेश देने के उद्देश्य से देवी पाताल भैरवी की भव्य मुखाकृति से प्रकट होने का दृश्य दिखाया गया है। खास बात यह है कि पाताल के अन्य दृश्य भी पंडाल में बनाए गए हैं। 10 हजार स्क्वायर फीट में तालाब बनाया गया है, जिसमें बतख तैरती दिखाई देती हैं। मनमोहक झरना भी बनाया गया है, वहीं श्रद्धालुओं को गुजरने के लिए एक छोटा पुल भी बनाया है। झांकी के एक अन्य हिस्से में आकाश का दृश्य भी है, जिसमें चांद पर विराजमान गणेश का दृश्य भी मनोहारी है।
Tuesday, September 25, 2018
जीवन की विसंगतियों का संवेदनशील चित्रण
. अनिता श्रीवास्तव का यह दूसरा कहानी संग्रह, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में
सामाजिक एवं निजी संबंधों की कटुताओं, जटिलताओं एवं विषमताओं की सतही
संवेदनाओं का सजीव चित्रण है। पुस्तक का शीर्षक ‘निःशब्द’ कितना सटीक एवं
सार्थक है कि कहानी-दर-कहानी, पृष्ठ-दर-पृष्ठ जीवन की कलुषता, वीभत्सता को
बयां करता, उसे निरन्तर चित्रित करता चला जाता है। और आप स्तब्ध, निःशब्द
से मर्माहत हो जाते हैं कि ऐसा समाज संवेदनशील व्यक्ति की परिकल्पना से परे
है। लगने लगता है कि जो जीवन हम जीते हैं, उसका फैलाव कितना स्वार्थी है
कि हम एकदम असहाय से मूकदर्शक बने रह जाते हैं। संग्रह में पन्द्रह
कहानियां हैं जो संवेदनात्मक गहराई, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आन्तरिक
भावों की टीस को बखूबी सम्प्रेषित करती हैं।
पहली ही कहानी ‘स्मृतियां’ मां का अपनी संतान के लिए स्नेह, ममता, प्यार जन्म से हर आयु तक शाश्वत रहता है। वह उसके अभाव में केवल स्मृतियों में ही जीती है।
कहानी क्या होती है— ‘ये आंसू नहीं मोती हैं’ पढ़ने के बाद ही आप अनुभूत कर पाएंगे कि पापा-बेटी का वात्सल्य शब्दातीत होता है। पिता का बच्चों के प्रति स्नेह, दायित्व एवं लगाव, उसे बच्चों एवं बेटी के सफल भविष्य के लिए दूसरी शादी न करने से बाधित करते हैं तथा चित्रकला के माध्यम से लेखिका भावनात्मक जुड़ाव को ‘रेखाएं भी बोलती हैं, बहुत कुछ बोलती हैं।’
‘फूल मर जाएगा’ किस जीवंतता से बच्ची के विछोह को एक दूसरी बच्ची के बिम्ब में चित्रित किया, साम्प्रदायिक दंगों व उनके प्रभाव को लेकर सामाजिक विद्रूपता के घिनौने पहलू को दर्शाता है।
शीर्षक कहानी ‘निःशब्द’ प्यार को व्याख्यायित करती है कि प्यार एक अहसास है, अनुभूति है, प्यार निःशब्द है जो जीवनभर आपको सालता है, यदि वह पूर्णता की पराकाष्ठा पर नहीं पहुंच पाता। यही है कि दहेज एक खुद्दार लड़की से उसका प्रेम छीन लेता है और वह मजबूरी से घिरी एक एेसी स्थिति पर पहुंच जाती है जहां वह मात्र एक खिलौना-मात्र रह जाती है। ‘मुर्झाया हुआ फूल’ कहानी हृदय-विदारक है, जहां माता-पिता अपनी बेटी को निजी व्यस्तताओं के कारण समय नहीं दे पाते, बेशक पैसा है, सुख है, सुविधा है परन्तु प्यार, वात्सल्य का अभाव बेटी को अपूर्ण ही रखता है। तभी तो वह कहती है ‘नहीं मम्मी तुम झूठ बोलती हो कि तुम्हें मुर्झाए हुए फूल ज़रा भी अच्छे नहीं लगते। एक फूल तुम्हारे घर में सोलह साल से मुर्झा रहा है।’
नारी अस्मिता का प्रश्न, ‘एक सच’ में सार्वभौमिक रूप में उकेरा गया है जहां पुरुष प्रधान समाज में पुरुष का सामन्तशाही व्यवहार आज भी जस का तस है और नारी की निरीहता, असमर्थता इन शब्दों में फूटती है— ‘मुझे कोई नहीं बचा सकेगा। क्योंकि मैं तो हूं ही नहीं, जो है ही नहीं, उसकी रक्षा करने का प्रश्न अपने आप में बेमानी है।’
‘निःशब्द’ कहानी संग्रह किन स्थितियों, परिस्थितियों से गुज़र कर उभरा है, लेखिका के शब्दों में ‘मेरी रचना-वस्तु मेरे इर्द-गिर्द फैला हुआ परिवेश और अतिपरिचित यथार्थ रहा है… जैसे कोई तथ्य एक घाव की तरह मन में धीरे-धीरे रिसता रहता है।’ बस इतना-सा अंकुर ही काफी है कि कहानियां बेहद सामयिक ज्वलन्त विषयों की पृष्ठभूमि को सिद्धहस्तता से प्रेषित करती हैं, उकेरती हैं, जो एकदम मार्मिकता से आपको भीतर तक उद्वेलित कर देती हैं। कहानियों का ताना-बाना एक ओर आपको आरम्भ से अंत तक बांधे रखता है तो दूसरी ओर साहित्यिक मुहावरे भी आपके भीतर पैठते जाते हैं। इस सशक्त भाषा में लिखी गई कहानियां, पठनीय हैं। ‘निःशब्द’ की हृदय-विदारक घटनाओं और परिस्थितियों का आकलन शब्दातीत है।
0पुस्तक : निःशब्द 0लेखिका : डॉ. अनिता श्रीवास्तव 0प्रकाशक : दीपक पब्लिशर्स, जयपुर 0पृष्ठ संख्या : 127 0मूल्य समय जीवन के परिप्रेक्ष्य में स्वाभाविकतः बदलता है। मनुष्य उस समय के अनुसार स्वयं को बदलने का प्रयत्न करता है। यहां स्थायित्व कम एक विशेष किस्म का भटकाव जरूर दिखाई देता है। जब भटकाव के माध्यम से स्थायित्व की परिकल्पना करते हुए व्यक्ति-मन वर्तमान के साथ-साथ अतीत की परख करता है तो मस्तिष्क में उठ रहीं ‘समय-समय की यादें’ उसे निर्देशित करती हैं। कवि राजेश हजारी यादों के निर्देशन में जीवन का जो सच प्रस्तुत करते हैं, वह हमारे समय और समाज का सच है।
सच कहने का साहस कवि कई स्थानों पर दिखाता है। ‘अनाज का बोझ’, ‘सहनशीलता की हद हो गयी’ ‘नस्ल का जूनून’, ‘विलायती भी हो गयी अब भारत सी’ कविताएं उस सच को सामने लाती हैं, जिससे हम गुजरते तो हैं लेकिन उनके सच से मुखातिब होने का कष्ट नहीं उठाना चाहते। बारिश के मौसम में किसान से प्रश्न पूछते उसके सच को कुछ इस तरह प्रस्तुत करता है— ‘बरसते पानी में घर को सी रहा है/ मौसमें गुल में तुझे/ क्या एक भी तिनका नहीं मिला/ गेहूं और सरसों की बाली/ अभी भी फल फूल रही है।’ सच यह भी है कि किसान गेहूं की बाली और सरसों के फूलों से दूर हुआ है। इसलिए भी क्योंकि उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति इसमें हो पाना सम्भव नहीं है।
कवि के सच में समकालीन समस्याएं गहरे में शामिल हैं। वह दो देशों के बीच जारी युद्ध की भयावहता से आहत है। उसके सामने ही सैनिकों की लड़ाई में ‘मां की ममता कराह रही है निरंतर/ बहन की शादी से पहले भाई की हो गयी कलाई सूनी’ बावजूद इसके सरकारें जाग नहीं रही हैं। उनके द्वारा कुछ ऐसा नहीं किया जा रहा है कि जन-मानस शांति की सम्भावना से खुश हो सके— ‘लोक सेवक सो रहे हैं सिर पर बांधे कफ़न/ देश में फैली आतंक की लहर।’
स्त्रियां सुरक्षित हैं या असुरक्षित, इस विषय पर इन दिनों खूब बहस हो रही है देश में। ‘कैसा चलन है कैसा विश्राम है’ कविता में कवि समकालीन हिंदी कविता में अनवरत भोग्या और कमजोर दिखाई जाने की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर नारी को शक्तिशाली मानता है। कविता की ये पंक्तियां स्त्रियों के सबल होने के प्रमाण हैं— ‘नारी तुम अबला नहीं सबला हो/ किसी की पत्नी हो, मां हो,/ बहन हो, देवरानी हो,/ समानता का अधिकार तुम्हारे पास है/ न्यायालय का द्वारा तुम्हारे लिए ख़ास हैं।’
स्मृतियों के सहारे जीवन-समय को परखना भी कविता की नियति है। राजेश हजारी का कर्म में अधिक विश्वास है। कवि का मानना है कि हमें अपने ही परिश्रम का विश्वास करना चाहिए। ‘नस्ल का जूनून/ चंद दिन का होता है/ सुख-दुःख में पलने वाला/ सदा खुशनसीब होता है।’ यह खुशनसीबी उसी को नसीब होती है जो जीवन-समय में तरलता के साथ प्रवाहित होना जानता है।
‘समय-समय की यादें’ लिए राजेश हजारी का यह कविता संग्रह हमारे समय के सच को सरल और सहजता से प्रस्तुत करता है। भावुकता की अधिकता और बहुत कहते जाने की जल्दबाजी में कविताई जरूर कमजोर दिखाई देती है लेकिन अंत तक पाठक के मन-मस्तिष्क में प्रवाह बना रहता है क्योंकि कविताएं उसके अपने समय और संसार के सच को सामने रखती हैं।
0पुस्तक : समय-समय की यादें (कविता संग्रह) 0कवि : राजेश हजारी 0प्रकाशन : साहित्य सागर प्रकाशन, जयपुर 0पृष्ठ संख्या : 112 0मूल्य : रु.200.
पहली ही कहानी ‘स्मृतियां’ मां का अपनी संतान के लिए स्नेह, ममता, प्यार जन्म से हर आयु तक शाश्वत रहता है। वह उसके अभाव में केवल स्मृतियों में ही जीती है।
कहानी क्या होती है— ‘ये आंसू नहीं मोती हैं’ पढ़ने के बाद ही आप अनुभूत कर पाएंगे कि पापा-बेटी का वात्सल्य शब्दातीत होता है। पिता का बच्चों के प्रति स्नेह, दायित्व एवं लगाव, उसे बच्चों एवं बेटी के सफल भविष्य के लिए दूसरी शादी न करने से बाधित करते हैं तथा चित्रकला के माध्यम से लेखिका भावनात्मक जुड़ाव को ‘रेखाएं भी बोलती हैं, बहुत कुछ बोलती हैं।’
‘फूल मर जाएगा’ किस जीवंतता से बच्ची के विछोह को एक दूसरी बच्ची के बिम्ब में चित्रित किया, साम्प्रदायिक दंगों व उनके प्रभाव को लेकर सामाजिक विद्रूपता के घिनौने पहलू को दर्शाता है।
शीर्षक कहानी ‘निःशब्द’ प्यार को व्याख्यायित करती है कि प्यार एक अहसास है, अनुभूति है, प्यार निःशब्द है जो जीवनभर आपको सालता है, यदि वह पूर्णता की पराकाष्ठा पर नहीं पहुंच पाता। यही है कि दहेज एक खुद्दार लड़की से उसका प्रेम छीन लेता है और वह मजबूरी से घिरी एक एेसी स्थिति पर पहुंच जाती है जहां वह मात्र एक खिलौना-मात्र रह जाती है। ‘मुर्झाया हुआ फूल’ कहानी हृदय-विदारक है, जहां माता-पिता अपनी बेटी को निजी व्यस्तताओं के कारण समय नहीं दे पाते, बेशक पैसा है, सुख है, सुविधा है परन्तु प्यार, वात्सल्य का अभाव बेटी को अपूर्ण ही रखता है। तभी तो वह कहती है ‘नहीं मम्मी तुम झूठ बोलती हो कि तुम्हें मुर्झाए हुए फूल ज़रा भी अच्छे नहीं लगते। एक फूल तुम्हारे घर में सोलह साल से मुर्झा रहा है।’
नारी अस्मिता का प्रश्न, ‘एक सच’ में सार्वभौमिक रूप में उकेरा गया है जहां पुरुष प्रधान समाज में पुरुष का सामन्तशाही व्यवहार आज भी जस का तस है और नारी की निरीहता, असमर्थता इन शब्दों में फूटती है— ‘मुझे कोई नहीं बचा सकेगा। क्योंकि मैं तो हूं ही नहीं, जो है ही नहीं, उसकी रक्षा करने का प्रश्न अपने आप में बेमानी है।’
‘निःशब्द’ कहानी संग्रह किन स्थितियों, परिस्थितियों से गुज़र कर उभरा है, लेखिका के शब्दों में ‘मेरी रचना-वस्तु मेरे इर्द-गिर्द फैला हुआ परिवेश और अतिपरिचित यथार्थ रहा है… जैसे कोई तथ्य एक घाव की तरह मन में धीरे-धीरे रिसता रहता है।’ बस इतना-सा अंकुर ही काफी है कि कहानियां बेहद सामयिक ज्वलन्त विषयों की पृष्ठभूमि को सिद्धहस्तता से प्रेषित करती हैं, उकेरती हैं, जो एकदम मार्मिकता से आपको भीतर तक उद्वेलित कर देती हैं। कहानियों का ताना-बाना एक ओर आपको आरम्भ से अंत तक बांधे रखता है तो दूसरी ओर साहित्यिक मुहावरे भी आपके भीतर पैठते जाते हैं। इस सशक्त भाषा में लिखी गई कहानियां, पठनीय हैं। ‘निःशब्द’ की हृदय-विदारक घटनाओं और परिस्थितियों का आकलन शब्दातीत है।
0पुस्तक : निःशब्द 0लेखिका : डॉ. अनिता श्रीवास्तव 0प्रकाशक : दीपक पब्लिशर्स, जयपुर 0पृष्ठ संख्या : 127 0मूल्य समय जीवन के परिप्रेक्ष्य में स्वाभाविकतः बदलता है। मनुष्य उस समय के अनुसार स्वयं को बदलने का प्रयत्न करता है। यहां स्थायित्व कम एक विशेष किस्म का भटकाव जरूर दिखाई देता है। जब भटकाव के माध्यम से स्थायित्व की परिकल्पना करते हुए व्यक्ति-मन वर्तमान के साथ-साथ अतीत की परख करता है तो मस्तिष्क में उठ रहीं ‘समय-समय की यादें’ उसे निर्देशित करती हैं। कवि राजेश हजारी यादों के निर्देशन में जीवन का जो सच प्रस्तुत करते हैं, वह हमारे समय और समाज का सच है।
सच कहने का साहस कवि कई स्थानों पर दिखाता है। ‘अनाज का बोझ’, ‘सहनशीलता की हद हो गयी’ ‘नस्ल का जूनून’, ‘विलायती भी हो गयी अब भारत सी’ कविताएं उस सच को सामने लाती हैं, जिससे हम गुजरते तो हैं लेकिन उनके सच से मुखातिब होने का कष्ट नहीं उठाना चाहते। बारिश के मौसम में किसान से प्रश्न पूछते उसके सच को कुछ इस तरह प्रस्तुत करता है— ‘बरसते पानी में घर को सी रहा है/ मौसमें गुल में तुझे/ क्या एक भी तिनका नहीं मिला/ गेहूं और सरसों की बाली/ अभी भी फल फूल रही है।’ सच यह भी है कि किसान गेहूं की बाली और सरसों के फूलों से दूर हुआ है। इसलिए भी क्योंकि उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति इसमें हो पाना सम्भव नहीं है।
कवि के सच में समकालीन समस्याएं गहरे में शामिल हैं। वह दो देशों के बीच जारी युद्ध की भयावहता से आहत है। उसके सामने ही सैनिकों की लड़ाई में ‘मां की ममता कराह रही है निरंतर/ बहन की शादी से पहले भाई की हो गयी कलाई सूनी’ बावजूद इसके सरकारें जाग नहीं रही हैं। उनके द्वारा कुछ ऐसा नहीं किया जा रहा है कि जन-मानस शांति की सम्भावना से खुश हो सके— ‘लोक सेवक सो रहे हैं सिर पर बांधे कफ़न/ देश में फैली आतंक की लहर।’
स्त्रियां सुरक्षित हैं या असुरक्षित, इस विषय पर इन दिनों खूब बहस हो रही है देश में। ‘कैसा चलन है कैसा विश्राम है’ कविता में कवि समकालीन हिंदी कविता में अनवरत भोग्या और कमजोर दिखाई जाने की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर नारी को शक्तिशाली मानता है। कविता की ये पंक्तियां स्त्रियों के सबल होने के प्रमाण हैं— ‘नारी तुम अबला नहीं सबला हो/ किसी की पत्नी हो, मां हो,/ बहन हो, देवरानी हो,/ समानता का अधिकार तुम्हारे पास है/ न्यायालय का द्वारा तुम्हारे लिए ख़ास हैं।’
स्मृतियों के सहारे जीवन-समय को परखना भी कविता की नियति है। राजेश हजारी का कर्म में अधिक विश्वास है। कवि का मानना है कि हमें अपने ही परिश्रम का विश्वास करना चाहिए। ‘नस्ल का जूनून/ चंद दिन का होता है/ सुख-दुःख में पलने वाला/ सदा खुशनसीब होता है।’ यह खुशनसीबी उसी को नसीब होती है जो जीवन-समय में तरलता के साथ प्रवाहित होना जानता है।
‘समय-समय की यादें’ लिए राजेश हजारी का यह कविता संग्रह हमारे समय के सच को सरल और सहजता से प्रस्तुत करता है। भावुकता की अधिकता और बहुत कहते जाने की जल्दबाजी में कविताई जरूर कमजोर दिखाई देती है लेकिन अंत तक पाठक के मन-मस्तिष्क में प्रवाह बना रहता है क्योंकि कविताएं उसके अपने समय और संसार के सच को सामने रखती हैं।
0पुस्तक : समय-समय की यादें (कविता संग्रह) 0कवि : राजेश हजारी 0प्रकाशन : साहित्य सागर प्रकाशन, जयपुर 0पृष्ठ संख्या : 112 0मूल्य : रु.200.
Thursday, September 6, 2018
संथारा का मतलब क्या आत्महत्या होता है?
जैन मुनि तरुण सागर की हाल ही में
मृत्यु हुई थी. वो 51 साल के थे. जैन मुनि के क़रीबियों का कहना था कि
उन्होंने संथारा लिया था और वो अन्न त्याग कर चुके थे.
इसके बाद से
संथारा को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गई. कई लोगों ने संथारा का
विरोध किया और इसे आत्महत्या बताया तो कई समर्थन में भी नज़र आए. अब ऐसे
में संथारा का मतलब और उसे लेकर हो रहे विवाद को जानना ज़रूरी हो जाता है. नागपुर की ऋचा जैन के ससुर ने भी संथारा लिया था. वह बताती हैं, ''जब मेरी बहन के ससुर नरेंद्र कुमार जैन ने संथारा लेने का फ़ैसला लिया था तब घर में उत्सव का माहौल था. क्योंकि जिसका जीवन परिपूर्ण है और जिसके भाग्य में समाधि मृत्यु है, उन्हें ही ये प्राप्त होता है.''
2015 में नरेंद्र कुमार जैन ने संथारा लेने का फ़ैसला किया था. इसके बाद उन्हें गुरु से आदेश मिलने का इंतज़ार करना पड़ा. आचार्य विद्यासागर ने उन्हें इजाज़त दी और उसके बाद नरेंद्र कुमार जैन के लिए संथारा का रास्ता खुल गया.
ऋचा कहती हैं, ''धार्मिक आदेश है कि अगर किसी ने संथारा लेकर समाधि मृत्यु प्राप्त की हो तो उस पर दुख करने की बजाय उत्सव मनाना चाहिए. उसी आदेश का पालन हम लोग करते हैं.''
नरेंद्र कुमार जैन ऐसे कई जैन साधकों में से एक हैं जिन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए संथारा का मार्ग स्वीकार किया. महाराष्ट्र में कई लोग संथारा लेते हैं.
जैन धर्म में ऐसी मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति या जैन मुनि अपनी ज़िंदगी पूरी तरह जी लेता है और शरीर उसका साथ देना छोड़ देता है तो उस वक्त वो संथारा ले सकता है.
संथारा को संलेखना भी कहा जाता है. संथारा एक धार्मिक संकल्प है. इसके बाद वह व्यक्ति अन्न त्याग करता है और मृत्यु का सामना करता है.
जैन धर्म को मानने वाले न्यायमूर्ति टी. के. तुकोल की लिखी किताब 'संलेखना इज़ नॉट सुसाइड' में कहा गया है कि संथारा का उद्देश्य आत्मशुद्धि है. इसमें संकल्प लिया जाता है. कर्म के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष मिलना मनुष्य जन्म का उद्देश्य होता है. इस उद्देश्य में संथारा से मदद मिलती है.
संथारा लेने की धार्मिक आज्ञा किसी गृहस्थ और मुनि या साधु को है.
दूसरी शताब्दी में आचार्य समंतभद्र के लिखे हुए 'रत्नकरंड श्रावकाचार' ग्रंथ में संथारा का उल्लेख पाया जाता है. श्रावक या साधक का व्यवहार कैसा होना चाहिए उसके बारे में इस ग्रंथ में बताया गया है. इसे जैन धर्म का एक प्रमुख ग्रंथ माना जाता है.
इसमें कहा गया है कि मुश्किल हालातों में, सूखा पड़ने पर, बुढ़ापे में या लंबी बीमारी में कोई व्यक्ति संथारा ले सकता है.
जो व्यक्ति इसका संकल्प लेता है उसे साफ़ मन से और बुरी भावना छोड़कर, सबकी ग़लतियां माफ़ करनी चाहिए और अपनी ग़लतियां माननी चाहिए.
धर्म के मुताबिक़, धर्मगुरु ही किसी व्यक्ति को संथारा की इजाज़त दे सकते हैं. उनकी इजाज़त के बाद वो व्यक्ति अन्न त्याग करता है. उस व्यक्ति के आसपास धर्मग्रंथ का पाठ किया जाता है और प्रवचन होता है.
उस व्यक्ति को मिलने के लिए कई लोग आते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं. जिसने संथारा लिया है, उस व्यक्ति की मृत्यु को समाधि मृत्यु कहा जाता है.
उनके पार्थिव शरीर को पद्मासन में बैठाया जाता है और जुलूस निकाला जाता है.
जैन धर्म में संथारा आस्था का विषय है पर कुछ लोग इस प्रथा का विरोध करते हैं. ऐसा कहा जाता है कि मानवतावादी दृष्टिकोण से यह प्रथा आत्महत्या का स्वरूप है.
साल 2006 में निखिल सोनी ने संथारा के ख़िलाफ़ जनहित याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया था कि संथारा की प्रथा आत्महत्या जैसी ही है और इसे आधुनिक समय में मान्यता न दी जाए.
इस याचिका में ये भी कहा गया कि संथारा लिए हुए व्यक्ति के घर का समाज में स्थान बढ़ जाता है और इस वजह से इस प्रथा को परिवार की तरफ़ से भी प्रोत्साहन दिया जाता है.
2015 में राजस्थान हाई कोर्ट ने इस याचिका पर फ़ैसला सुनाया. कोर्ट ने संथारा प्रथा को ग़ैर-क़ानूनी बताया. कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर धर्म ग्रंथ में ये कहा भी गया है कि संथारा से मोक्ष की प्राप्ति होती है तो भी यह मोक्ष प्राप्ति का सिर्फ़ एक ही मार्ग नहीं है. यह प्रथा जैन धर्म के लिए अनिवार्य नहीं है. ऐसा कहते हुए राजस्थान कोर्ट ने संथारा पर प्रतिबंध लगा दिया था.
निखिल सोनी के वकील माधव मित्र ने बीबीसी को बताया था कि यह एक महत्वपूर्ण फैसला है. संथारा लेने के लिए प्रेरणा देने वाले या फिर उस व्यक्ति का समर्थन करने वालों को आईपीसी की धारा 306 के अनुसार दोषी माना जाएगा.
लेकिन हाई कोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को स्थगित करते हुए संथारा की प्रथा को जारी रखने की इजाज़त दी है. बई और मुंबई उपनगर में संथारा लेने की वालों की संख्या अधिक है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 2015 में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार गत सात सालों में मुंबई और मुंबई उपनगर में लगभग 400 संथारा लिए गए.
डोंबिवली से नालासोपारा तक एक के बाद एक लोगों ने संथारा लिया. डोंबिवली के रंताशी शामजी सावला ने संथारा लेने के बाद कुछ ही दिनों में उनका निधन (समाधि मृत्यु) हो गया.
उसके बाद नालासोपारा की कस्तूरीबेन गाला ने संथारा लिया. 17वें दिन उनका भी निधन (समाधि मृत्यु) हो गया. बाबू लाल जैन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से उस वक़्त कहा था, ''एक के बाद एक लिए जाने वाले संथारा की वजह से जैन समाज एकसूत्र बंधा हुआ है.''
राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात इन राज्यों में जैन समुदाय बड़े पैमान में रहता है. यहां भी बहुत से लोग संथारा लेते हैं.
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